नई दिल्ली/तेहरान:
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में लगातार बढ़ता तनाव क्या सिर्फ कच्चे तेल की राजनीति और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण तक ही सीमित है? वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों की मानें तो कहानी इससे कहीं ज्यादा गहरी और बड़ी है। इस पूरे टकराव के पीछे असली खेल भविष्य के बेशकीमती खनिजों यानी ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ पर कब्जे और वैश्विक प्रभुत्व की जंग का है।
ईरान के पास है 22 करोड़ टन का ‘गुप्त खजाना’
भू-वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पास दुनिया का करीब 5% यानी 22 करोड़ टन (220 मिलियन टन) से अधिक जिंक (जस्ता) और लेड (सीसा) का विशाल भंडार मौजूद है। यह कोई साधारण खनिज नहीं हैं, बल्कि इन्हें आधुनिक युग की ‘रीढ़’ माना जाता है। आज के समय में इन खनिजों की सबसे ज्यादा जरूरत निम्नलिखित क्षेत्रों में होती है:
- इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरियां: भविष्य के ऑटोमोबाइल सेक्टर को चलाने के लिए।
- आधुनिक उद्योग और इलेक्ट्रॉनिक्स: हाई-टेक गैजेट्स और मैन्युफैक्चरिंग के लिए।
- परमाणु संयंत्र : ऊर्जा और रणनीतिक सुरक्षा के लिए।
अमेरिका दूर, चीन-रूस ने बनाई त्रिमूर्ति
लंबे समय से लगे पश्चिमी और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अमेरिका की दिग्गज कंपनियां तो ईरान के इस बाजार से पूरी तरह दूर हैं। लेकिन इस शून्य को भरने के लिए ईरान ने चीन और रूस के साथ मिलकर एक बेहद मजबूत और रणनीतिक नेटवर्क तैयार कर लिया है:
- चीन की भूमिका: चीन वर्तमान में ईरान के इन खनिजों का सबसे बड़ा खरीदार है और वहां के माइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में बड़ा पार्टनर बना हुआ है।
- रूस का निवेश: रूस इस क्षेत्र की नई और अत्याधुनिक परियोजनाओं में भारी निवेश कर रहा है।
यह जंग विचारधारा की नहीं, प्रभुत्व की है
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के सामने भले ही यह लड़ाई वैचारिक या क्षेत्रीय वर्चस्व की दिखाई दे रही हो, लेकिन पर्दे के पीछे यह भविष्य की तकनीक पर नियंत्रण हासिल करने की होड़ है। जो भी देश इन ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ के स्रोतों और सप्लाई चेन पर नियंत्रण रखेगा,आने वाले समय में वैश्विक महाशक्ति की चाबी उसी के पास होगी। यही वजह है कि मिडिल ईस्ट की इस जंग में पूरी दुनिया की महाशक्तियां सीधे या परोक्ष रूप से कूदी हुई हैं।
मुख्य स्रोत: India.Com – Hindi

