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चालीहा महोत्सव पर करणी सेना के वीरेंद्र सिंह तोमर ने सिंधी समाज को दी शुभकामनाएं, कहा- यह पर्व देता है संयम और प्रकृति संरक्षण का संदेश

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रायपुर: सिंधी समाज के पवित्र 40 दिवसीय चालीहा महोत्सव की शुरुआत के अवसर पर क्षत्रिय करणी सेना, छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह तोमर ने सिंधी समाज के सभी श्रद्धालुओं को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि आस्था, तपस्या और आत्मसंयम का यह महापर्व समाज में शांति, सद्भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है।

वीरेंद्र सिंह तोमर ने अपने शुभकामना संदेश में कहा कि चालीहा महोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन और जीवन मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देने वाला पर्व है। उन्होंने कहा कि 40 दिनों तक चलने वाली साधना व्यक्ति को व्यसनों से दूर रहने, संयमित जीवन जीने और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश देती है। उन्होंने विशेष रूप से नदियों के संरक्षण और जल के महत्व को इस पर्व का प्रमुख संदेश बताया।

उन्होंने कहा कि चालीहा महोत्सव के प्रारंभ के साथ ही रायपुर सहित देश और विदेश में बसे सिंधी समाज के श्रद्धालु भगवान झूलेलाल की आराधना, भजन-कीर्तन और विशेष पूजा-अर्चना में जुट गए हैं। यह पर्व समाज की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

कठोर नियमों के साथ होती है साधना

चालीहा महोत्सव के दौरान श्रद्धालु 40 दिनों तक विशेष धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं।
इस अवधि में कई श्रद्धालु बालों में कंघी नहीं करते, दाढ़ी और बाल नहीं कटवाते, जूते-चप्पलों का त्याग करते हैं तथा जमीन पर विश्राम करते हैं। साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। परंपरा के अनुसार श्रद्धालु प्रारंभ के नौ दिन या अंतिम नौ दिन व्रत रखते हैं और दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।

भगवान झूलेलाल से जुड़ी है महोत्सव की मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग एक हजार वर्ष पहले सिंध प्रदेश में मिरख बादशाह के अत्याचारों से पीड़ित लोगों ने सिंधु नदी के तट पर 40 दिनों तक भगवान वरुण देव की कठोर आराधना की थी। मान्यता है कि भगवान वरुण ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे रतन राय के घर पुत्र रूप में जन्म लेकर लोगों को अत्याचारों से मुक्ति दिलाएंगे।

इसके बाद वर्ष 991 में नसरपुर में उदय चंद का जन्म हुआ, जिन्हें आगे चलकर भगवान झूलेलाल के रूप में पूजा गया। कहा जाता है कि उन्होंने अत्याचार का अंत कर समाज की रक्षा की। इसी स्मृति में सिंधी समाज हर वर्ष श्रद्धा और भक्ति के साथ चालीहा महोत्सव मनाता है।

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