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माजीसा माँ के 338वें जन्मोत्सव पर करणी सेना ने दी बधाई, वीरेंद्र सिंह तोमर ने देश-विदेश के भक्तों की खुशहाली की कामना की

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रायपुर। माजीसा माँ के अवतरण दिवस और 338वें जन्मोत्सव के अवसर पर क्षत्रिय करणी सेना ने श्रद्धापूर्वक बधाई दी। करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष और किसान नेता वीरेंद्र सिंह तोमर ने माजीसा माँ के चरणों में शीश नवाते हुए छत्तीसगढ़ सहित देश-विदेश में रहने वाले उनके भक्तों की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।

वीरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि माजीसा माँ का अवतरण राजस्थान के जैसलमेर जिले के जोगीदास गाँव में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी, विक्रम संवत 1745 को हुआ माना जाता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के निरंतर विकास और प्रदेशवासियों की सुख-शांति के लिए प्रार्थना की। साथ ही माजीसा माँ के धाम के दर्शन के लिए रवाना हुए श्रद्धालुओं के दल की मंगलमय यात्रा की कामना की।

माँ भटियानी के नाम से प्रसिद्ध माजीसा माँ की आस्था और उनसे जुड़ी लोक मान्यताओं को नमन करते हुए तोमर ने कहा कि वे स्वयं भी एक बार माजीसा माँ के धाम के दर्शन करना चाहते हैं।

कौन हैं माजीसा माँ?

राजस्थान में माजीसा माँ को रानी भटियानी सा, रानी स्वरूप कँवर, भुआसा, मोतियाँवाली माँ और जसोल की धनियानी जैसे अलग-अलग नामों से श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार उनका मूल नाम स्वरूप कँवर था। उनका अवतरण दिवस 2 सितंबर 1688 को माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार उस दिन भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि थी और यह विक्रम संवत 1745 का समय था।

माजीसा माँ का संबंध राजस्थान के जैसलमेर जिले के जोगीदास गाँव से बताया जाता है। जैसलमेर से करीब 85 किलोमीटर दूर स्थित इस गाँव को वर्तमान में जोगीदास धाम के नाम से भी जाना जाता है। मायके में स्वरूप कँवर को भुआसा या भुआजी के नाम से पूजा जाता है, जबकि जसोल में उन्हें माजीसा माँ और रानी भटियानी सा के नाम से श्रद्धा प्राप्त है।

जोगीदास गाँव की स्थापना से जुड़ा इतिहास

लोक इतिहास के अनुसार जोगीदास गाँव का संबंध जैसलमेर के भाटी राजवंश से रहा है। बताया जाता है कि राजश्री खेतसिंह के वंश में पंचावण दास और उनके बाद पृथ्वीराज हुए। पृथ्वीराज के पांच पुत्रों में जोगीदास सबसे बड़े थे। पृथ्वीराज को भाटीसरा क्षेत्र की जागीर मिली थी, जिसे वर्तमान में दक्षिणी बसिया क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।

बताया जाता है कि पृथ्वीराज के बड़े पुत्र जोगीदास ने विक्रम संवत 1741 में जोगीदास का गाँव बसाया था। वे इस क्षेत्र के पहले जागीरदार माने जाते हैं। उनके द्वारा गोगासर कुआं और राणासर तालाब बनवाए जाने की भी परंपरा बताई जाती है।

लोककथाओं के अनुसार जोगीदास के विवाह के बाद लंबे समय तक उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने भाटी वंश की कुलदेवी माँ स्वांगिया जी की विशेष पूजा-अर्चना की। मान्यता है कि देवी की कृपा से विक्रम संवत 1745 के भादवा सुदी सप्तमी को स्वरूप कँवर का जन्म हुआ।

जन्म के नौवें दिन उनका नाम स्वरूप कँवर रखा गया। आगे चलकर यही स्वरूप कँवर लोक आस्था में रानी भटियानी सा और माजीसा माँ के रूप में पूजी जाने लगीं।

रानी स्वरूप कँवर का जसोल से जुड़ा प्रसंग

स्वरूप कँवर के विवाह योग्य होने के बाद उनका विवाह मालानी राज्य के जसोल के रावल कल्याण सिंह से हुआ। विवाह के बाद उन्हें रानी सा के नाम से संबोधित किया गया। भाटी कुल में जन्म होने के कारण उन्हें रानी भटियानी सा भी कहा जाने लगा।

लोक परंपरा के अनुसार स्वरूप कँवर से कल्याण सिंह को पुत्र लालसिंह की प्राप्ति हुई। बाद में बड़ी रानी देवड़ी अणंदकँवर को भी पुत्र प्रतापसिंह हुआ। दोनों रानियों के बीच स्नेह और सम्मान के संबंध बताए जाते हैं।

माजीसा माँ से जुड़ी लोककथा में आगे बताया जाता है कि राजपरिवार में परिस्थितियां बदलने लगीं। श्रावणी तीज के अवसर पर लालसिंह की तबीयत बिगड़ी और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। पुत्र की मृत्यु के बाद स्वरूप कँवर ने अन्न-जल त्याग दिया। मान्यता के अनुसार 22 जनवरी 1719 को उन्होंने अपने पुत्र लालसिंह को गोद में लेकर देह त्याग दी।

मंगणियार रामा से जुड़ी लोक मान्यता

माजीसा माँ की कथा में मंगणियार रामा का प्रसंग भी प्रमुखता से बताया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार रामा जब जोगीदास गाँव से जसोल पहुंचे तो उन्हें स्वरूप कँवर के देह त्यागने की जानकारी मिली। इसके बाद वे कागा श्मशान घाट पहुंचे और उन्होंने स्वरूप कँवर की आराधना की।

कथा के अनुसार इसी दौरान स्वरूप कँवर ने उन्हें दर्शन दिए और मायके में संदेश पहुंचाने के लिए मिश्री सहित कुछ वस्तुएं दीं। रामा ने जोगीदास गाँव पहुंचकर यह जानकारी परिवार को दी। इस प्रसंग से जुड़ी अन्य मान्यताओं में भगवान दास नामक सुनार की आंखों की रोशनी लौटने की कथा भी कही जाती है।

इन घटनाओं के बाद स्वरूप कँवर को देवी स्वरूप मानकर पूजा किए जाने की परंपरा आगे बढ़ी। जसोल में लूणी नदी के किनारे स्थित स्थान पर भी उनके मंदिर की स्थापना से जुड़ी मान्यता प्रचलित है।

जोगीदास धाम में मंदिर और प्राण प्रतिष्ठा

जोगीदास गाँव में भी समय के साथ माँ स्वरूप कँवर की पूजा की परंपरा विकसित हुई। स्थानीय मान्यता के अनुसार एक छोटे से थान पर पूजा-अर्चना की जाती थी। बाद में भाटी परिवार, वडेरा परिवार और दक्षिणी बसिया क्षेत्र के लोगों के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया।

विक्रम संवत 2056, आसोज सुदी तेरस यानी 23 अक्टूबर 1999 को नवनिर्मित मंदिर में माँ स्वरूप कँवर और उनके पुत्र लालसिंह की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद विक्रम संवत 2065, आसोज सुदी चौदस यानी 13 अक्टूबर 2008 को साँवाईसिंह की मूर्ति की भी प्राण प्रतिष्ठा की गई।

माजीसा माँ से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में क्षेत्र के जलस्रोतों का उल्लेख भी मिलता है। क्षेत्रवासियों के अनुसार कुछ कुओं में पहले खारा पानी आता था, लेकिन बाद में पानी मीठा होने और जलस्तर बढ़ने की बात कही जाती है। श्रद्धालु इसे माजीसा माँ का आशीर्वाद मानते हैं।

माजीसा माँ का 338वां जन्मोत्सव राजस्थान सहित देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों में रहने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विशेष अवसर है। इसी अवसर पर किसान नेता वीरेंद्र सिंह तोमर ने माजीसा माँ को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी भक्तों के सुख, शांति, समृद्धि और मंगल की कामना की।

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