श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन-भत्तों के साथ पूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ाने को लेकर पेश किए गए तीन संशोधन विधेयकों को लेकर सियासत गरमा गई। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विरोध के बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इन तीनों विधेयकों को विधानसभा से वापस ले लिया। इन विधेयकों के जरिए मंत्रियों, विधायकों और पूर्व विधायकों से जुड़े वेतन, भत्ते और पेंशन कानूनों में बदलाव का प्रस्ताव था।
28 सितंबर को विधानसभा में पेश किए गए थे बिल
उमर अब्दुल्ला ने 28 सितंबर को जम्मू-कश्मीर विधानसभा के मौजूदा सत्र में तीन अलग-अलग संशोधन विधेयक पेश किए थे। इनमें जम्मू-कश्मीर मंत्रियों और राज्य मंत्रियों के वेतन अधिनियम, 1956, जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा सदस्यों के वेतन एवं भत्ते अधिनियम, 1960 और जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा सदस्यों की पेंशन अधिनियम, 1984 में संशोधन का प्रस्ताव था।
प्रस्तावित बदलावों के तहत विधायकों के वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी तथा पूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ाने का प्रावधान बताया गया था। रिपोर्टों के मुताबिक विधायकों का मासिक वेतन और भत्ते 1.30 लाख रुपये से बढ़ाकर 1.65 लाख रुपये और पूर्व विधायकों की पेंशन 50 हजार रुपये से बढ़ाकर 60 हजार रुपये करने का प्रस्ताव था।
BJP ने किया विरोध
इन विधेयकों को लेकर विधानसभा में BJP ने विरोध जताया। पार्टी की ओर से कहा गया कि जनप्रतिनिधियों के वेतन और भत्ते बढ़ाने के बजाय सरकार को कम वेतन पर काम कर रहे दिहाड़ी मजदूरों और एडहॉक कर्मचारियों के नियमितीकरण तथा उनके कल्याण से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के मौजूदा सत्र में BJP पहले भी दिहाड़ी मजदूरों के नियमितीकरण समेत विभिन्न कर्मचारी मुद्दों को उठाती रही है।
उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा?
विधेयकों को वापस लेने के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वह विधानसभा में आम सहमति के बिना वेतन बढ़ोतरी से जुड़ा कोई विधेयक पारित नहीं कराएंगे। उन्होंने विपक्ष पर इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप भी लगाया। रिपोर्ट के मुताबिक, उमर ने यह भी स्पष्ट किया कि वेतन बढ़ोतरी को लेकर सदन में व्यापक सहमति जरूरी है।
अब आगे क्या?
तीनों विधेयकों के वापस लिए जाने के बाद फिलहाल जम्मू-कश्मीर में विधायकों, मंत्रियों और पूर्व विधायकों के वेतन-भत्तों तथा पेंशन में प्रस्तावित बढ़ोतरी लागू नहीं होगी। मामले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस जरूर जारी है। अब सरकार की ओर से इस मुद्दे पर आगे क्या कदम उठाया जाता है, इस पर नजर रहेगी।

