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अमेरिका-ईरान इस्लामाबाद MoU पर भारत में सियासी बहस तेज, जयराम रमेश ने बताया विदेश नीति के लिए ‘गंभीर झटका’

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नई दिल्ली/इस्लामाबाद, 18 जून 2026: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) को लेकर भारत में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस महासचिव Jairam Ramesh ने इस घटनाक्रम को प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व वाली सरकार की विदेश नीति के लिए “गंभीर झटका” बताते हुए कई सवाल उठाए हैं।

  • क्या है इस्लामाबाद MoU?

सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुए इस समझौते का उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव कम करना और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण Strait of Hormuz में सामान्य आवाजाही बहाल करने की दिशा में काम करना है।

समझौते के तहत दोनों पक्षों ने 60 दिनों के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एक व्यापक एवं स्थायी समझौते की दिशा में बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है।

  • कांग्रेस का हमला, सरकार से जवाब की मांग

इस समझौते पर प्रतिक्रिया देते हुए जयराम रमेश ने कहा कि दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में हो रहे इस बड़े कूटनीतिक घटनाक्रम में भारत की भूमिका स्पष्ट नहीं दिख रही है। कांग्रेस का आरोप है कि पाकिस्तान की राजधानी में इतनी महत्वपूर्ण वार्ता का होना और भारत का इस प्रक्रिया से बाहर दिखाई देना चिंता का विषय है।

विपक्ष का कहना है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक स्थिति क्या है और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

  • भारत के लिए क्यों अहम है यह समझौता?

Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस परिवहन मार्गों में गिना जाता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की संभावना बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान इस संवाद प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में नए रणनीतिक समीकरण उभर सकते हैं। इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और विभिन्न देशों के कूटनीतिक संबंधों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

  • अगले 60 दिन पर दुनिया की नजर

विश्लेषकों के अनुसार, आगामी दो महीने बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि अमेरिका और ईरान परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर किसी व्यापक समझौते तक पहुंचते हैं, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, मध्य-पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।

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